प्रस्तावना
विजयादशमी 2025 के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर स्थित रेशिमबाग मैदान में संघ कार्यकर्ताओं एवं समाज को संबोधित किया। यह अवसर विशेष था क्योंकि संघ अपनी शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है। भागवत जी ने अपने भाषण में इतिहास की प्रेरणाओं, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर गंभीर व प्रेरक विचार रखे।
भागवत जी ने कहा कि भारत आज विश्व की नज़र में एक आशा का केंद्र है। हमें आत्मनिर्भर होकर, स्वदेशी को अपनाकर और समाज की सामूहिक शक्ति को एकजुट करके ही भविष्य की चुनौतियों का सामना करना होगा। उन्होंने गुरू तेग बहादुर, महात्मा गांधी और अन्य महापुरुषों के त्याग को याद किया और वर्तमान पीढ़ी को उनसे प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
उन्होंने आतंकवाद, आंतरिक अस्थिरता, आर्थिक दबाव, पर्यावरण संकट और सामाजिक बदलाव जैसे मुद्दों का उल्लेख किया और स्पष्ट किया कि इन सबका समाधान केवल एकजुटता, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता में है।
भाषण के मुख्य बिंदु
- इतिहास से प्रेरणा: गुरू तेग बहादुर के बलिदान और महात्मा गांधी के योगदान का स्मरण।
- समाज की भूमिका: परिवर्तन केवल नेताओं या संगठनों से नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामूहिक प्रयास से आता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: आतंकी घटनाओं और विघटनकारी तत्वों के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता: भारत को अपने संसाधनों पर आधारित होकर आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- स्वदेशी पर बल: अंतरराष्ट्रीय व्यवहार भारत की स्वेच्छा से होना चाहिए, दबाव में नहीं।
- पर्यावरण चेतावनी: हिमालय की स्थिति को “खतरे की घंटी” बताते हुए संतुलित विकास की आवश्यकता।
- वैश्विक दृष्टिकोण: भारत को विश्वगुरु और विश्वमित्र बनने के लिए अपने आदर्शों के आधार पर नेतृत्व करना होगा।
प्रेरणादायक पंक्तियाँ
- “आत्मनिर्भरता सब बातों की कुंजी है। अपना देश आत्मनिर्भर होना चाहिए।”
- “देश की नीति में स्वेच्छा से अंतरराष्ट्रीय व्यवहार होना चाहिए, दबाव में नहीं। यही स्वदेशी है।”
- “नेताओं या संगठनों के भरोसे रहकर देश को महान नहीं बनाया जा सकता; पूरे समाज के सामूहिक प्रयास से ही परिवर्तन आता है।”
- “अगर भारत विश्वगुरु और विश्वमित्र बनना चाहता है तो उसे अपने दृष्टिकोण के आधार पर भविष्य में आने वाली समस्याओं के लिए अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा।”
- “हिमालय की वर्तमान स्थिति हमारे लिए खतरे की घंटी बजा रही है।”
निष्कर्ष
मोहन भागवत जी का यह भाषण केवल एक औपचारिक संबोधन नहीं था, बल्कि पूरे समाज को दिशा देने वाला संदेश था। इसमें इतिहास की प्रेरणा, वर्तमान की चुनौतियाँ और भविष्य की राह – तीनों का समावेश है।
भारत को स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और समाज की सामूहिक शक्ति के बल पर ही विश्वगुरु बनने का मार्ग प्रशस्त करना है।