जलियांवाला बाग (अमृतसर) में स्थित शहीद स्मारक, जहां 13 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश भारतीय सेना की गोलियों से सैकड़ों निहत्थे लोग मारे गए थे (जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक)। 13 अप्रैल 1919 का दिन भारतीय इतिहास में एक दर्दनाक मोड़ बनकर दर्ज है। अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ शांतिपूर्ण सभा पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर जलियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम दिया गया, जिसमें सैकड़ों बेगुनाह भारतीयों की जान गई। इस नृशंस कृत्य ने ब्रिटिश राज और भारतीय जनता के बीच अविश्वास की खाई को बेहद गहरा कर दिया तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी। परंतु एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ब्रिटिश सरकार ने औपचारिक रूप से माफ़ी नहीं मांगी है, जो पीड़ितों की स्मृति और उपनिवेशवादी अन्याय की ऐतिहासिक चर्चा में एक केंद्रीय प्रश्न बना हुआ है। इस ब्लॉग में हम जलियांवाला बाग जनसंहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ब्रिटिश सरकार की अब तक की प्रतिक्रियाओं, आज तक औपचारिक माफ़ी न दिए जाने के तथ्य, और इसके नैतिक एवं ऐतिहासिक निहितार्थों पर गहराई से नज़र डालेंगे। साथ ही, इस बात पर तर्कपूर्ण व भावनात्मक रूप से चर्चा करेंगे कि इस घटना के लिए ब्रिटिश सरकार की एक ईमानदार माफ़ी क्यों अत्यावश्यक है।

1919 का अमृतसर जनसंहार
जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की सबसे वीभत्स घटनाओं में से एक है। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पावन दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग नामक खुले मैदान में हजारों निहत्थे भारतीय – जिनमें महिलाएं, बच्चे और वृद्ध शामिल थे – शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्रित थे। ये लोग अंग्रेज़ सरकार द्वारा दो स्वतंत्रता सेनानियों सैफ़ुद्दीन किचलू व डॉ. सत्यपाल की गिरफ़्तारी का विरोध करने और बैसाखी उत्सव मनाने इकट्ठे हुए थे। ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर ने उस दिन शहर में मार्शल लॉ जैसा प्रतिबंध लगा रखा था और बिना चेतावनी दिए अपनी ब्रिटिश-भारतीय को जलियांवाला बाग में जमा भीड़ पर गोली चलाने का हुक्म दियाtheguardian.com। बाग के मुख्य निकास को बंद कर दिया गया और लगभग दस मिनट तक सिपाहियों ने गोलियां बरसाईं, जब तक कि उनके पास गोलियां ख़त्म नहीं हो गईंtheguardian.com। ब्रिटिश राज के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए और ~1,200 घायल हुए, परंतु कई स्वतंत्र स्रोतों का अनुमान है कि वास्तविक मृतकों की संख्या 1,000 के करीब या उससे भी अधिक थीindependent.co.uk। सैकड़ों लोग अपनी जान बचाने के लिए बाग में स्थित एक कुएँ में कूद गए, जिसे आज “शहीद कुआँ” कहा जाता है।
इस नरसंहार की ख़बर से पूरे भारत में भारी रोष फैल गया। रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे राष्ट्रवादी intelectuales ने विरोधस्वरूप अपने ब्रिटिश सम्मान लौटा दिए – टैगोर ने 1915 में प्राप्त अपनी “नाइटहुड” की उपाधि 1919 में इस कांड के विरोध में त्याग दीbritannica.com। महात्मा गांधी ने पहले तो इस घटना पर गहरा शोक प्रकट किया और बाद में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ अपना पहला देशव्यापी असहयोग आंदोलन (1920-22) आरंभ कियाbritannica.com। जलियांवाला बाग की रक्तरंजित मिट्टी ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा देते हुए लाखों लोगों के हृदय में आज़ादी का संकल्प और प्रबल कर दिया।
ब्रिटिश सत्ता के भीतर भी कुछ ज़िम्मेदार आवाज़ों ने इस गोलीकांड की आलोचना की। ब्रिटेन के युद्ध मंत्री विंस्टन चर्चिल ने घटना के एक साल बाद हाउस ऑफ़ कॉमन्स में जलियांवाला बाग कांड को “एक बेहद भयंकर घटना, जो ब्रिटिश इतिहास में अद्वितीय और वीभत्स रूप में खड़ी है” (अंग्रेज़ी में “a monstrous event, an event which stands in singular and sinister isolation”) कहकर इसकी निंदा की थीtheguardian.com। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गठित हंटर कमीशन ने जनरल डायर की कार्यवाही की आलोचना की, और डायर को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि, ब्रिटिश अभिजात्य वर्ग में विभाजन भी दिखा – एक ओर हाउस ऑफ कॉमन्स ने इस बर्बरता पर विरोध जताया, तो दूसरी ओर हाउस ऑफ लॉर्ड्स में जनरल डायर के पक्ष में सराहना के सुर भी सुनाई दिए और उसे “पंजाब का रक्षक” तक कहकर एक तलवार भेंट की गईbritannica.com। इस दोहरे रवैये के बावजूद आधुनिक इतिहासकारों की दृष्टि में जलियांवाला बाग नरसंहार ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सबसे काले अध्यायों में से एक है, जिसने साम्राज्यवादी शासन की क्रूरता को उजागर कर दिया।
ब्रिटिश सरकार की अब तक की प्रतिक्रिया और बयानों का सिलसिला
ब्रिटिश सरकार ने इस जनसंहार के लिए औपचारिक माफ़ी आज तक नहीं मांगी हैen.wikipedia.org, लेकिन समय-समय पर इसे लेकर खेद जताने या बयान देने का सिलसिला ज़रूर रहा है। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में लंदन से इस मुद्दे पर चुप्पी साधी गई, लेकिन भारत की आज़ादी की 50वीं वर्षगांठ पर 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने भारत यात्रा के दौरान अमृतसर का दौरा किया। उम्मीद थी कि ब्रिटिश राजतंत्र की ओर से शायद कोई माफ़ी आएगी, पर ऐसा नहीं हुआ। महारानी ने जलियांवाला बाग स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की और एक राजकीय भोज में अपने भाषण में इतिहास की इस त्रासदी का उल्लेख करते हुए कहा: “It is no secret that there have been some difficult episodes in our past. Jallianwala Bagh is a distressing example… History cannot be rewritten, however much we might wish otherwise.” (अर्थात “यह सर्वविदित है कि हमारे अतीत में कुछ कष्टदायक प्रसंग रहे हैं – जलियांवाला बाग इसका पीड़ादायक उदाहरण है… इतिहास को फिर से लिखा नहीं जा सकता, भले ही हम कितना चाहें।”)theguardian.com। महारानी के इन शब्दों को एक व्यक्तिगत खेद के रूप में देखा गया, पर ये किसी आधिकारिक क्षमायाचना से कोसों दूर थे। उनके साथ आए राजकुमार फिलिप ने तो अनौपचारिक तौर पर मृतकों की संख्या पर संदेह जताने वाला विवादित बयान भी दे दिया था, जिसने पीड़ा कम करने के बजाय भारतीय जनभावना को आहत ही किया।
फ़रवरी 2013 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन इस ऐतिहासिक स्थल का दौरा करने वाले पहले सत्तारूढ़ ब्रिटिश प्रधानमंत्री बने। कैमरन ने जलियांवाला बाग स्मारक पर सिर झुकाकर श्रद्धांजलि दी और आगंतुक पुस्तिका में इस घटना को ब्रिटिश इतिहास की एक “गहनत: शर्मनाक घटना” (“deeply shameful event in British history”) लिखाtheguardian.com। उन्होंने वहाँ एक बयान में Winston Churchill के 1920 के शब्दों को उद्धृत किया और खुद स्वीकार किया कि यह गोलीबारी “ब्रिटिश इतिहास पर एक कलंक” है। लेकिन जब उनसे ब्रिटेन की ओर से औपचारिक माफ़ी की मांग के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया। कैमरन का तर्क था: “I don’t think the right thing is to reach back into history and to seek out things you can apologise for.” (यानि “मुझे नहीं लगता कि इतिहास में पीछे जाकर हर उस बात के लिए माफ़ी मांगना सही होगा जिसे आप गलत ठहरा चुके हैं।”)theguardian.com। कैमरन ने कहा कि ब्रिटिश सरकार ने 1919 में ही जनरल डायर के कृत्य की निंदा कर दी थी, इसलिए दशक बाद औपचारिक माफ़ी की आवश्यकता नहीं हैtheguardian.com। उनका मानना था कि घटनाओं को स्मरण करना और उनके सबक सीखना पर्याप्त है, पर प्रत्येक ऐतिहासिक अन्याय के लिए मौजूदा पीढ़ी को माफ़ी मांगने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिएtheguardian.com। उनके इस रुख़ से कई लोगों को निराशा हुई। अमृतसर में शहीद परिवारों के वंशजों ने सवाल उठाया कि “यदि उन्होंने इसे शर्मनाक कहा है, तो माफ़ी क्यों नहीं मांगी?”theguardian.com। स्पष्ट था कि ब्रिटिश सरकार अभी भी शब्द “सॉरी” बोलने से कतरा रही थी।
दिसंबर 2017 में लंदन के मेयर सादिक़ ख़ान ने अपने भारत दौरे पर जलियांवाला बाग का दौरा करने के बाद ब्रिटिश सरकार से औपचारिक रूप से माफ़ी मांगने की अपील की। ख़ान ने कहा, “सरकार को अब माफ़ी मांगनी चाहिए, खासकर जब हम इस नरसंहार की शताब्दी के करीब हैं। यह यहाँ जो हुआ, उसे सही ढंग से स्वीकार करने और अमृतसर तथा भारत के लोगों को एक औपचारिक माफ़ी के जरिएClosure (समापन) देने के बारे में है।”independent.co.uk ब्रिटिश सरकार ने इस सुझाव को भी ठुकरा दिया। ब्रिटेन के विदेश कार्यालय (Foreign Office) के प्रवक्ता ने उस समय वही पुरानी बात दोहराई जो कैमरन कह चुके थे: “जैसा कि 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने जलियांवाला बाग पर कहा था, यह घटना ब्रिटिश इतिहास में गहराई तक शर्मनाक है और हम इसे कभी नहीं भुला सकते। ब्रिटिश सरकार ने उस समय इन घटनाओं की ठीक ही निंदा की थी।”independent.co.uk। इस आधे-अधूरे बयान में भी खेद प्रकट करना (“deeply shameful”, “should never forget”) था, लेकिन क्षमा याचना (“हम माफ़ी मांगते हैं” या “We are sorry”) का सीधा उल्लेख गायब था। ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने उल्टा यह भी जोड़ दिया कि 1919 में ही इस कृत्य की निंदा कर दी गई थी और पूर्ववर्ती सरकारों ने इस मामले में शोक जताया है, मानो यह पर्याप्त हो।
अप्रैल 2019 में जलियांवाला बाग कांड के 100 वर्ष पूरे होने पर भारत में और ब्रिटेन के प्रवासी भारतीय समुदाय में यह मांग जोर पकड़ चुकी थी कि ब्रिटिश सरकार इस अवसर पर औपचारिक माफ़ी देकर ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभाए। ब्रिटिश संसद में भी इस पर चर्चा हुई। हाउस ऑफ कॉमन्स (संसद के निचले सदन) में भारतीय मूल के सांसद वीरेंद्र शर्मा समेत कई सांसदों ने सरकार से शताब्दी पर माफ़ी जारी करने को कहाindianexpress.comindianexpress.com। Conservative पार्टी के सांसद बॉब ब्लैकमन ने March 2019 में एक बहस की अगुवाई करते हुए जोर दिया कि “जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए क्षमा याचना करना यूके सरकार की ज़िम्मेदारी है” और यह सही वक़्त है जब हम इस ऐतिहासिक अन्याय के लिए माफ़ी मांगेंindianexpress.com। इन बहसों के बीच उस समय की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने 10 अप्रैल 2019 को हाउस ऑफ कॉमन्स में आधिकारिक बयान दिया। मे ने उस घटना को ब्रिटिश-भारतीय इतिहास पर एक “शर्मनाक दाग़” की संज्ञा दी और दुख जताते हुए कहा: “The tragedy of Jallianwala Bagh of 1919 is a shameful scar on British Indian history. As Her Majesty the Queen said… it is a ‘distressing example’ of our history with India. We deeply regret what happened and the suffering caused.”hansard.parliament.uk प्रधानमंत्री थेरेसा मे के इन शब्दों – “गहरी ख़ेद” (“deeply regret”) और “शर्मनाक दाग़” (“shameful scar”) – को मीडिया ने सुर्खियों में जगह दी। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि उनके पूरे वक्तव्य में कहीं भी “माफ़ी” (apology या sorry) शब्द शामिल नहीं था। למעשה, उन्होंने भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह औपचारिक माफ़ी से बचते हुए केवल गहरा खेद प्रकट किया। विपक्ष के नेता जेरेमी कॉर्बिन ने तुरंत इस आधे-अधूरे रवैये पर प्रतिक्रिया दी। कॉर्बिन ने संसद में मे की बात के जवाब में कहा कि जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की स्मृति के प्रति “पूर्ण, स्पष्ट और बेहिचक माफ़ी” ब्रिटेन को माँगनी चाहिएhansard.parliament.uk। लेकिन सरकार ने उस मांग को अनसुना कर दिया।
उसी सप्ताह, ब्रिटिश विदेश राज्य मंत्री मार्क फ़ील्ड ने भी एक संसदीय बहस के दौरान सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट किया। उन्होंने स्वीकार किया कि यह घटना एक “शर्मनाक अध्याय” है, मगर बार-बार माफ़ी मांगने को लेकर सरकार की आपत्ति जताई। मार्क फ़ील्ड ने कहा, “I feel a little reluctant to make apologies for things that have happened in the past… We debase the currency of apologies if we are seen to make them for many, many events.”indianexpress.comindianexpress.com। उनके मुताबिक सरकार को यह चिंता है कि हर ऐतिहासिक गलती पर क्षमायाचना करने से “माफ़ी की मूल्य-वत्ता कम हो जाएगी” और साथ ही यह भी संकेत दिया कि औपचारिक माफ़ी से कानूनी या वित्तीय दावों के दरवाज़े खुल सकते हैंindianexpress.com। फ़ील्ड का कहना था कि सरकार “गहरे खेद” (deepest regret) प्रकट करती है और इतिहास से सबक लेने पर जोर देती है, लेकिन माफ़ी की मांग पर अभी आंतरिक चर्चा जारी हैindianexpress.com। दुर्भाग्यवश, उन चर्चाओं का नतीजा आज तक नहीं निकला है और ब्रिटिश हुकूमत ने आधिकारिक तौर पर क्षमा-याचना करने से परहेज़ बरकरार रखा है।
ब्रिटिश प्रतिष्ठान के इस रुख से विश्वभर में फैले भारतीय समुदाय और निष्पक्ष इतिहासविदों को बार-बार निराशा हाथ लगी है। सितंबर 2022 में महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के निधन के बाद भारत में कई लोगों ने उनके प्रति व्यक्तिगत सम्मान जताया, पर साथ ही याद दिलाया कि भारत को आज भी औपचारिक माफ़ी का इंतज़ार हैtheguardian.comtheguardian.com। यह बात स्पष्ट है कि ब्रिटिश सरकार ने आज तक जलियांवाला बाग हत्याकांड पर कोई formal apology नहीं दिया है, केवल खेद और अफसोस के शब्द कहे हैंen.wikipedia.org।
औपचारिक माफ़ी का अभाव: नैतिक एवं ऐतिहासिक निहितार्थ
एक सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद जलियांवाला बाग जनसंहार के लिए ब्रिटेन की ओर से माफ़ी न आना महज़ शब्दों की कमी नहीं, बल्कि एक गहरे नैतिक प्रश्न को जन्म देता है। ब्रिटिश सरकार द्वारा औपचारिक माफ़ी न देने का तथ्य ऐतिहासिक अन्याय की स्मृति को और पीड़ादायक बनाता है। 1919 में किए गए नरसंहार की ज़िम्मेदारी भले ही वर्तमान पीढ़ी की नहीं, लेकिन उस अन्याय को स्वीकार करने और उसके लिए खेद जताने की ज़िम्मेदारी आज भी एक नैतिक दायित्व के रूप में मौजूद है। माफ़ी से सताए हुए को संतोष मिलता है और देने वाले की महानता प्रदर्शित होती है। यदि उस पाप के लिए आज तक औपचारिक खेद तक सीमित रहा जाए और क्षमा याचना न की जाए, तो पीड़ितों के वंशजों व संबंधित समुदायों के लिए वह घटना एक “नासूर की तरह हरी” (running sore) बनी रहती है, जिस पर मरहम नहीं लगाया गयाindianexpress.com।
ब्रिटिश हुकूमत के प्रतिनिधियों ने माफ़ी न देने के पक्ष में जो तर्क दिए हैं, उनके भी अपने गंभीर निहितार्थ हैं। उदाहरण के लिए, यह कहना कि “हमारे पूर्वजों के कर्मों के लिए हम माफ़ी क्यों माँगे” या “इतिहास में पीछे जाकर हर गलती के लिए माफ़ी माँगना उचित नहीं” – ऐसा रुख यह संकेत देता है कि वर्तमान ब्रिटिश राज्य अपने औपनिवेशिक अतीत की गलतियों से पूरी तरह नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेना चाहताtheguardian.com। इसके पीछे कानूनी भय या मुआवज़े के दावों की चिंता भी हो सकती हैindianexpress.com, किंतु इसका परिणाम यही होता है कि साम्राज्यवाद के पीड़ित और उनके वंशज यह महसूस करते हैं कि उनके साथ हुए अन्याय को अब तक पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है। 1919 में ही निंदा कर देने की बात कहकर आज माफ़ी से बचना, पीड़ितों के ज़ख्मों पर मरहम रखने के बजाय नमक छिड़कने जैसा है – मानो इतनी बड़ी त्रासदी के लिए एक साधारण “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” कह देना काफी था।
इतिहासकारों और नैतिक दार्शनिकों का मत है कि ऐतिहासिक अपराधों की औपचारिक स्वीकृति और क्षमा-याचना एक सभ्य समाज की पहचान है। जर्मनी ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यह साहस दिखाया कि नाज़ी अत्याचारों के लिए बार-बार माफ़ी मांगी, शिक्षा प्रणाली में उन्हें स्वीकारा, और पीड़ित समुदायों को प्रतिकार दिया। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी मूल निवासियों के प्रति हुए अत्याचारों के लिए औपचारिक क्षमायाचनाएं जारी की हैं। इसकी तुलना में ब्रिटेन ने अपने औपनिवेशिक काल के कई काले अध्यायों पर खेद तो जताया है, लेकिन माफ़ी से बचने की प्रवृत्ति दिखाई हैindianexpress.comindianexpress.com। केन्या में मऊ मऊ विद्रोह के दमन या बंगाल के भुखमरी जैसे कृत्यों पर भी ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक माफ़ी नहीं मांगी है, हालांकि कुछ मामलों में मुआवज़े देने या regret व्यक्त करने का प्रयास अवश्य हुआ। जलियांवाला बाग के संदर्भ में, ब्रिटेन की यह अनिच्छा अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े करती है – क्या आज का ब्रिटेन अपने इतिहास के कड़वे सच को पूरी विनम्रता से स्वीकार करने को तैयार है?
नैतिक दृष्टि से देखें तो क्षमा याचना का अभाव पीड़ितों की स्मृति के प्रति एक तरह की बेरुख़ी दर्शाता है। जलियांवाला बाग उन निर्दोष लोगों की कब्रगाह है जिनका एकमात्र “अपराध” उस दिन आज़ादी की आकांक्षा रखना या त्योहार मनाने आना था। इन शहीदों के परिजनों को एक सदी बाद भी आधिकारिक माफ़ी के दो शब्द न मिलना इतिहास से सामूहिक संवाद की विफलता दर्शाता है। भारत में इसे साम्राज्यवादी अहंकार का अवशेष माना जाता है कि इतनी बड़ी त्रासदी के लिए अभी तक एक स्पष्ट क्षमायाचना नहीं आई। इसका नैतिक प्रभाव यह है कि ब्रिटेन द्वारा पूर्व उपनिवेशों के प्रति पूर्ण पश्चाताप (remorse) प्रकट करने में कमी रह जाती है, जिससे साम्राज्यवाद के जख्म पूरी तरह भर नहीं पाते।
ऐतिहासिक निहितार्थों की बात करें तो जलियांवाला बाग हत्याकांड को भुलाया नहीं जा सकता – न भारत में, न ब्रिटेन में। यह घटना भारत के राष्ट्रीय अभिमान और ब्रिटेन-भारत संबंधों के इतिहास का हिस्सा है। हर वर्ष इस कांड की बरसी पर भारत में श्रद्धांजलि समारोह होते हैं, स्कूलों के पाठ्यक्रम में इसे पढ़ाया जाता है, और भारत की आज़ादी की लड़ाई में यह एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है। ब्रिटेन द्वारा माफ़ी न देने से भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के मन में यह धारणा मज़बूत होती है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अपराधों का प्रायश्चित अभी अधूरा है। ये अधूरेपन के भाव द्विपक्षीय रिश्तों में एक भावनात्मक बाधा बनकर मौजूद रहते हैं, चाहे राजनीतिक स्तर पर संबंध कितने ही प्रगाढ़ हो जाएं। स्वयं ब्रिटिश संसद में कई सदस्य यह मानते हैं कि माफ़ी न देने से भारत के साथ संबंधों में एक अनकहा सा तनाव बना रहता हैindianexpress.com।
क्यों जरूरी है औपचारिक माफ़ी?
इतिहास के पन्नों पर दर्ज इस ख़ूनी अध्याय के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से औपचारिक माफ़ी क्यों आवश्यक है – इस प्रश्न का उत्तर भावनात्मक और तर्कसंगत, दोनों स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला, यह नैतिक न्याय और ऐतिहासिक दायित्व का सवाल है। माफ़ी मांगना उस अन्याय को पूर्णतः स्वीकार करना और उसके लिए खेद प्रकट करना है। जैसा ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमन कहते हैं, हम वर्तमान पीढ़ी के ब्रिटिश लोग 1919 की गोलीबारी के जिम्मेदार नहीं थे, “लेकिन हम बेहिचक कह सकते हैं कि जो हुआ वह घोर गलत था और हमें उस पर शर्मिंदा होते हुए माफ़ी मांगनी चाहिए”indianexpress.com। यह कथन इस बात पर जोर देता है कि क्षमा याचना करने से वर्तमान पीढ़ी पर कोई कलंक नहीं लगता, बल्कि यह दर्शाता है कि देश नैतिक साहस दिखा रहा है और अतीत की गलतियों को मानकर आगे बढ़ना चाहता है। जब तक माफ़ी नहीं आती, तब तक वह अन्याय राष्ट्रीय स्मृति में एक खुले घाव की तरह बना रहता है। ब्लैकमन ने ठीक ही कहा कि यदि हम माफ़ी नहीं मांगते, तो यह मुद्दा “लगातार रिसने वाले घाव” की तरह बना रहेगाindianexpress.com।
दूसरा, एक औपचारिक माफ़ी पीड़ितों और उनके वंशजों के घावों पर मरहम का काम करेगी और उन्हें भावनात्मक स्तर पर न्याय का अहसास दिलाएगी। जिन निर्दोष लोगों ने जलियांवाला बाग में प्राण त्यागे, उनकी आत्माओं को शायद न्याय या सुकून तभी मिलेगा जब उस अन्याय के लिए आधिकारिक तौर पर खेद नहीं बल्कि माफ़ी व्यक्त की जाए। भारत में आज भी लोग उस कुंए को देखते हैं जिसमें सैकड़ों लाशें मिली थीं, दीवारों पर गोलियों के निशान देखते हैं – और उन निशानों के साथ यह टीस भी जुड़ी है कि दोषी राज्य (ब्रिटिश हुकूमत) ने आज तक इस पाप के लिए क्षमा नहीं मांगी। “माफ़ी” शब्द उच्चारित होने से एक मनोवैज्ञानिक closure (समापन) मिलता हैindependent.co.uk। यह उन अनगिनत भारतीय परिवारों के लिए तसल्ली होगी जिनके पूर्वज उस बाग में मारे गए थे कि आखिरकार उनके साथ हुए भीषण अत्याचार को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है और उसके लिए खेद से आगे बढ़कर क्षमा याचना की गई है।
तीसरा, यह कदम भारत-ब्रिटेन संबंधों में सच्ची सुलह (reconciliation) और पारस्परिक सम्मान के लिए ज़रूरी है। आज ब्रिटेन और भारत रणनीतिक साझेदार हैं; व्यापार, शिक्षा, संस्कृति हर क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है। ब्रिटेन में भारतवंशी डायस्पोरा एक महत्वपूर्ण समुदाय है। इन संबंधों की बुनियाद और मजबूत हो सकती है यदि औपनिवेशिक दौर के अत्याचारों पर ब्रिटेन अपनी गलती मानकर क्षमा मांग ले। स्वयं ब्रिटिश नेताओं ने माना है कि कहीं न कहीं यह अधूरा हिसाब रिश्तों को प्रभावित करता हैindianexpress.com। एक माफ़ी का संदेश दोनों देशों की जनता को यह देगा कि हम अतीत की कड़वाहट को ईमानदारी से दूर कर भविष्य की ओर बढ़ना चाहते हैं। कैमरन ने 2013 में कहा था कि भारत के साथ हमारे संबंधों में अतीत अवरोध नहीं बल्कि सेतु का काम करने चाहिएtheguardian.com – यह तभी संभव है जब अतीत के जख्मों पर मरहम लगे, और उस मरहम का नाम माफ़ी है।
चौथा, एक औपचारिक माफ़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ब्रिटेन की नैतिक प्रतिष्ठा को बढ़ाएगी। यह प्रदर्शित करेगा कि ब्रिटेन अपने इतिहास के प्रति आत्मचेतस और जिम्मेदार राष्ट्र है, जो मानवाधिकारों व मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखता है। जैसा आर्चबिशप ऑफ़ कैंटरबरी जस्टिन वेल्बी ने 2019 में जलियांवाला बाग स्मारक पर लेटकर प्रार्थना करते हुए कहा था – “मैं इतिहास को बदल नहीं सकता, लेकिन प्रायश्चित में सिर झुकाकर केवल शर्मिंदगी और पश्चाताप ज़ाहिर कर सकता हूँ।” हालांकि वे ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे, लेकिन उनकी इस प्रतीकात्मक माफ़ी ने दुनियाभर में सुर्खियाँ बटोरीं और दिखाया कि इंसानियत के नाते क्षमा याचना करने से मर्यादा घटती नहीं, बढ़ती है।
अंततः, माफ़ी एक शब्द भर नहीं, बल्कि पीड़ितों के सम्मान की पुनर्स्थापना का वचन है। जलियांवाला बाग के शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उस अन्याय के लिए ब्रिटेन आधिकारिक रूप से क्षमा मांगे। एक “शर्मनाक दाग़” को स्वीकार भर कर लेना पर्याप्त नहीं; उसे धोने के लिए प्रायश्चित स्वरूप क्षमा-याचना करना ज़रूरी हैhansard.parliament.uk। यह माफ़ी कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की नैतिक शक्ति का प्रमाण होगी जो अपने अतीत का सामना सचाई और विनम्रता से करने को तैयार है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड को गुज़रे 100 से अधिक साल हो चुके हैं, लेकिन इसके दर्द और गूंज अभी भी जीवित हैं। यह कोई साधारण ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक क्रूरता का प्रतीक बन चुकी त्रासदी है, जिसने भारत की आज़ादी की लड़ाई को निर्णायक मोड़ दिया। ब्रिटिश शासन के इस काले अध्याय को ब्रिटेन की ओर से आज तक औपचारिक माफ़ी ना मिलना एक ऐसी कमी है जो दोनों देशों के ऐतिहासिक सम्बन्धों के दस्तावेज़ में महसूस की जाती रही है। अब समय आ गया है कि ब्रिटिश सरकार इस विषय पर नैतिक नेतृत्व दिखाते हुए स्पष्ट और औपचारिक रूप से क्षमा याचना करे।
एक सदी पुरानी घटना के लिए माफ़ी मांगना न तो आज के ब्रिटेन को छोटा बनाएगा, न ही इससे कोई कानूनी दायित्व अनिवार्य रूप से उत्पन्न होगा – बल्कि इससे ब्रिटेन के प्रति पूर्व उपनिवेशों के मन में सम्मान ही बढ़ेगा कि उसने मानवता के प्रति अपना कर्तव्य निभाया। यह कदम उन सैकड़ों निर्दोषों की आत्माओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगा जो जलियांवाला बाग में गोलियों का शिकार बने। इससे भारत और ब्रिटेन के लोगों के बीच ऐतिहासिक भरोसे का सेतु और मजबूत होगा, तथा औपनिवेशिक विरासत से उपजे कुछ कटु भावनात्मक अवशेष भी धीरे-धीरे मिटेंगे।
ब्रिटिश संसद में उठी आवाज़ों, ब्रिटिश व भारतीय नागरिक समाज, इतिहासकारों और पीड़ितों के वंशजों – सबकी यही अपेक्षा है कि आखिरकार “सॉरी” शब्द सुना जाए। ब्रिटेन के प्रमुख नेताओं ने इसे “गहरा खेदजनक” और “शर्मनाक” तो मान लिया है, अब इस प्रायश्चित को पूर्णता देने के लिए निर्विवाद रूप से एक औपचारिक माफ़ी मांगना बाकी हैtheguardian.comhansard.parliament.uk। जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री या सम्राट खुले शब्दों में जलियांवाला बाग के लिए माफ़ी मांग लेंगे, तभी इतिहास का यह घाव भरना शुरू होगा।
हम आशा करते हैं कि मानवाधिकार व समानता के जिस आदर्श की दुहाई आज ब्रिटेन देता है, उसे साकार करने हेतु वह अपने अतीत के इस पाप को स्वीकारते हुए क्षमा-याचना करेगा। यह सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं, पूरे विश्व को एक संदेश होगा कि सभ्यताएं अपनी भूलों से शर्मिंदा होकर क्षमा मांग सकती हैं और बेहतर भविष्य के लिए उनसे सबक ले सकती हैं। जलियांवाला बाग के शहीदों की याद में ब्रिटेन की माफ़ी एक देर से उठाया गया सही क़दम होगा, जो यह सुनिश्चित करेगा कि इतिहास की सही मायने में व्यापक व प्रभावशाली रूप से समीक्षा हुई है और न्याय की पुकार अंततः सुनी गई है।
स्रोत: नीचे उद्धृत सभी स्रोतों के लिंक व संदर्भ इस बात की पुष्टि करते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने जलियांवाला बाग हत्याकांड पर अभी तक कोई औपचारिक माफ़ी नहीं जारी की है, हालांकि कई नेताओं ने खेद व्यक्त किया है। साथ ही, इनमें ब्रिटिश संसद की कार्यवाही, आधिकारिक बयान और विश्वसनीय समाचार एजेंसियों की रिपोर्टें शामिल हैं:
- Michael Safi, The Guardian – “Theresa May expresses ‘regret’ for 1919 Amritsar massacre” (10 Apr 2019)theguardian.comtheguardian.com
- Nicholas Watt, The Guardian – “David Cameron defends lack of apology for British massacre at Amritsar” (20 Feb 2013)theguardian.comtheguardian.com
- House of Commons Official Report (Hansard) – Prime Minister Theresa May’s statement and Jeremy Corbyn’s response on Jallianwala Bagh centenary (10 Apr 2019)hansard.parliament.ukhansard.parliament.uk
- Molly Fleming, The Independent – “Amritsar massacre: Foreign Office rejects calls to apologise for mass killing of Sikhs by colonial troops” (9 Dec 2017)independent.co.ukindependent.co.uk
- PTI report, The Indian Express – “On Jallianwala Bagh’s 100th anniversary, UK says formal apology a ‘work in progress’” (9 Apr 2019)indianexpress.comindianexpress.com
- Hannah Ellis-Petersen, The Guardian – “‘There hasn’t been closure’: India mourns Queen but awaits apology” (14 Sep 2022)theguardian.comtheguardian.com
- विकिपीडिया (हिंदी एवं अंग्रेज़ी) – जलियांवाला बाग हत्याकांड पृष्ठ (संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण व आंकड़े)en.wikipedia.org
- Britannica Encyclopedia – “Jallianwala Bagh Massacre – History & Significance” (Rabindranath Tagore द्वारा नाइटहुडत्पाद आदि)britannica.combritannica.com
- Divya Goyal, The Indian Express – Interview with Bob Blackman, MP (14 Jun 2025)indianexpress.comindianexpress.com
इन स्रोतों के माध्यम से प्रस्तुत तथ्यों, आंकड़ों और वक्तव्यों की पुष्टि की जा सकती है। सभी उद्धरण संबंधित नेताओं/दस्तावेजों से शब्दशः लिए गए हैं, जिससे इस लेख की प्रामाणिकता बनी रहती है। ब्रिटिश संसद के बहस वृत्त, सरकारी बयान और प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में छपी ख़बरों का संदर्भ लेकर यह सुनिश्चित किया गया है कि जलियांवाला बाग हत्याकांड पर ऐतिहासिक सत्यता और वर्तमान स्थितियों का विश्लेषण भरोसेमंद और सटीक हो। अब समय की मांग है कि इन तथ्यों के आलोक में उचित कार्रवाई हो – यानी ब्रिटिश सरकार द्वारा औपचारिक क्षमायाचना – ताकि इतिहास के इस अध्याय का समापन न्यायपूर्ण तरीके से हो सके।